हिमाचल प्रदेश का प्राचीन इतिहास

प्रागेतिहासिक हिमाचल प्रदेश  :


   यह अवधि केवल पुरातात्विक तथ्यों पर निर्भर है।  इस अवधि को भी तीन भागों में बांटा गया। 


पुरापाषाण  काल –

                     1951  में नालागढ़ (हिन्दुर) सिरसा  नदी के दाएं और पथरों  से  बने हथियार मिले।  1955 में देहरा , ढलियारा आदि स्थानों पर भी  72  पथर के उपकरणों के नमूने मिले।  1974 में भी  मारकंडा नदी के सुकेती क्षेत्र में अवशेष मिले। 


मध्यपाषाण एवं नवपाषाण –

                     स्थाई कृषि और सभ्यताओं  का उद्गम यहीं से हुआ।  इस युग के प्रमाण मिटटी के बर्तनों से मिले। 

आद्यैतिहासिक (सिंधु सभ्यता के समय हिमाचल प्रदेश) के निवासी –


 * कोल –

         यह हिमाचल प्रदेश के मूल निवासी हैं।  इनके प्रमाण कुमाऊं की चंदेश्वर घाटी  से मिले 

* किरात –

          यह दूसरी यहां आने वाली जाती है।  महाभारत में किस्तों को हिमालय का निवास बताया गया।

* नाग –

          इस जाति के लोग पहाड़ियों में हर जगह वसते थे।  हड़प्पा सभ्यता में  भी मुहरों में नाग देवताओं को दिखाया। 

* खस –

          आर्यों की तीसरी जाति  जो मध्य एशिया से होकर जम्मू कश्मीर से होते हुए पूरे हिमालय में फैल गए।  कसीं का नाग जाति पर विजय के उपलब्ध में भुण्डा उत्स्व मनाया  जाता है। 


आर्य और हिमाचल  –

                आर्यों की  एक शाखा ने मध्य एशिया  से होते हुए भारत में प्रवेश किया ये वैदिक आर्य कह लाये।  इसका सामना यहां पर कोल ,किरात और नाग जातियों से हुआ। 


* शाम्बर दिवोदास युद्ध –

                40 वर्षों तक शाम्बर दस्यु  राजा तथा आर्य राजा दिवोदास के बीच हुआ।  जिसमें दिवोदास विजय रहा।  तथा आर्यों ने पुराणी जातियों को दुर्गम पहाड़ियों में रहने को विवश कर दिया  तथा  खसों को अपने में वलीन कर लिया। 

वैदिक काल –

 *  वैदिक आर्य –

                राजा “ययाति” जिसका पुत्र “पुरु”  राज्य का शासक बना। 


दशराग युद्ध : ऋग्वेद के अनुसार दिवोदास के पुत्र सूरदास का युद्ध दस आर्य तथा अनार्य राजाओं के बीच हुआ। जिसमें सुदास विजयी रहा। 


वैदिक ऋषि –

             मंडी को मांडव्य ऋषि से निरमंड को परशुराम से मनाली को मनु ऋषि से तथा कुल्लू घाटी में मनीकरण के पास स्थित वशिष्ठ कुंड गर्म पानी के चश्मे को वैदिक ऋषि वशिष्ठ से जोड़ा जाता है। 


जमदग्नि ऋषि : 

जामलु देवता के रूप में कुल्लू के मलना गाँव में पूजते है।  जमदग्नि ऋषि का निवास स्थान रेणुका झील के समीप जामू का टिब्बा सिरमौर जिले में स्थित है।


ऋषि परशुराम :

 उन्हें शिव का अवतार माना जाता है इनके पिता ऋषि जमदग्नि भी आर्य राज सहस्र अर्जुन के पुत्रों ने हत्या कर दी थी।  इसी कारण ऋषि परशुराम समस्त क्षत्रियों पर आक्रमण करने लगे। 


* महाभारत काल के हिमाचल प्रदेश के जनपद :

ओदुम्बर : ओदुम्बर के सिक्के काँगड़ा , पठानकोट , ज्वालामुखी , गुरदासपुर तथा होशियारपुर में मिले उन सिक्कों पर “त्रिशूल” तथा “महादेवसा” शब्द खुदा था।  ये भेड़पालक तथा शिव भगत थे।  इसलिए इनका संबंध गद्दी जाती से जोड़ा जाता है। 


त्रिगर्त : इसकी स्थापना भूमिचंद ने की थी , त्रिगर्त यह तीन नदियों के बीच का भ्हाग था।  रावी व्यास था सतलुज आदि त्रिगर्त का उल्लेख पाणिनि के अष्टाध्याई  कल्हण की राजतरंगिनी विष्णु पुराण तथा महाभारत के द्रोणपर्व में हुआ।


कुलिंद :

महाभारत के अनुसार कुलिंद पर अर्जुन ने विजय प्राप्त की थी।  कुलिंद , व्यास , सतलुज , यमुना के बीच की भूमि सिरमौर शिमला अम्बाला सहारनपुर के क्षेत्र शामिल थे।  यमुना नदी का नाम कालिंदी है तथा इसके साथ पड़ने वाले स्थानों को कुलिंद कहा  गया है।


* मौर्यकाल एवं मौर्योंत्तर काल :

मौर्यकाल

सिकंदर का आक्रमण : 326  के समय भारत पर आक्रमण किया जिसे हाइडेस्पीच के नाम से भी जाना जाता है।


चन्द्रगुप्त मौर्य :

चन्द्रगुप्त मौर्य ने पहाड़ी राजा और अपने प्रधानमंत्री ने मौर्य सम्राज्य खड़ा किया।  विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में इनके बीच संधियों का वर्णन मिला।  चन्द्रगुप्त मौर्य 323 ने नंदवंश का नाश कर सिहासन पर बैठा।


अशोक :

चन्द्रगुप्त मौर्य के पोते अशोक ने मझिम और 4 बौद्ध भिक्षुओं को हिमालय में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेजा।  हेनसांग के अनुसार अशोक ने कुल्लू तथा काँगड़ा  में चंतडू में स्थित है। 


* मोर्योत्तर काल :

मौर्यों के पतन के बाद शुंग वंश ने प-हदी राज्यों को अपने कब्जे में कर लिया परन्तु अधिक समय तक नहीं  रख सके वे जल्द ही स्वतंत्र हो गए। 

 शंकों के बाद कुषाणों के राजा कनिष्क के शासन काल में पहाड़ी राजाओं ने समर्पण कर दिया।  तीसरी शताब्दी के प्रारम्भ में कुषाणों की  शक्ति कमजोर पड़ गयी।  यौधेय , अर्जुनायन और कुलिंदों  ने मिलकर कुषाणों को सतलुज पार धकेल दिया।  कुषाणों के समय का एक सिक्का कांगड़ा के कनिहार में मिला है। 


* गुप्तकाल :

श्री गुप्त के पोते चन्द्रगुप्त प्रथम 319  में गुप्त सम्राज्य की नीव रखी।  भारत के  नेपोलियन समुद्रगुप्त ने 340 में पर्वतीयों जनपदों  की जीतकर इस पर  अपना अधिपत्य जमाया।  सभी राजाओं ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।  परन्तु कुलिंद का इसमें उल्लेख नहीं मिलता।  कुमार गुप्त के पुत्र स्कन्दगुप्त ने हूणों को पराजित कर गुप्त सम्राज्य की प्रतिष्ठा को बनाये रखा।  गुप्त काल में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ। 


* गुप्ततोतर काल :

 521 में हूणों ने तोरमाण के नेतृत्व में आक्रमण किया।  तोरमाण के पुत्र मिहिरकुल “भारत का एटिला भी कहा जाता है ।तोरमाण के पुत्र मिहिरकुल “भारत का एटिला” भी कहा जाता है।  525 में पंजाब से लेकर मध्य प्रदेश क्षेत्र पर आधिपत्य जमा लिया। 


* हर्षवर्धन एवं हेनसांग –

 हर्षवर्धन 606 में भारत की गद्दी पर बैठा।  हर्षवर्धन के शासन काल में हेनसांग ने भारत की 629 – 644  तक यात्रा की। हेनसांग 635 में जालंधर आया।  जालंधर के बाद कुल्लू , लाहौर और सिरमौर की यात्रा की।  उसने इन् सभी जगह का विस्तृत वर्णन किया है। चम्बा त्रिगर्त के अधीन , महायान धर्म का जिक्र  पुस्तक में किया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *