कांगड़ा

काँगड़ा 

जिले के रूप में गठन 01 नवंबर, 1966 और जिला मुख्यालय धर्मशाला में है
कांगड़ा जिले का कुल क्षेत्रफल 5739  वर्ग किलो मिटर है| प्राचीन काल में काँगड़ा त्रिगर्त के नाम से जाना जाता था| इसकी स्थापना महाभारत के पूर्व की मानी जाती है| त्रिगर्त की स्थापना भूमिचंद ने की थी | इसके 234वें राजा सुशर्मा ने जालंधर / त्रिगर्त के काँगड़ा में किले की स्थापना कर उसको अपनी राजधानी बनाया

 

* त्रिगर्त की राजधानी – नगरकोट को भीमकोट, भीमनगर, सुशर्मापुर के नाम से भी जाना जाता था| और “इसकी स्थापना सुशर्मा ने की थी”| महाभारत के युद्ध में सुशर्मा ने कौरवों का साथ दिया था

 *1615 में थॉमस कोरयत, 1666 में थेवेनोट, 1783 में फॉस्टर, और 183 में विलियम मूरक्राफ्ट ने काँगड़ा की यात्रा की थी |

 

* महमूद गजनवी ने 1009 में काँगड़ा पर आकर्मण किया था| उस समय काँगड़ा का राजा जगदीश चंद्र था|1043 तक काँगड़ा किला तुर्को के कब्जे में था| 1043 में काँगड़ा के किले को तोमर राजाओं ने आजाद करवाया था| 1051 -1052 में पुनः तुर्कों के कब्जे में चला गया| 1060 में काँगड़ा के राजाओं ने पुनः काँगड़ा के किले पर कब्जा कर लिया

 

* मुहममद बिन तुगलक ने 1337 में काँगड़ा पर आक्रमण किया था| उस समय काँगड़ा के राजा पृथ्वीचंद थे

 

 * फिरोजशाह तुगलक ने 1365 में काँगड़ा पर हमला किया| उस समय काँगड़ा के राजा रूपचंद थे | फिरोजशाह के पुत्र नसीरुद्दीन ने 1389 में भागकर नगरकोट पहाड़ियों में शरण ली उस समय काँगड़ा  के राजा सागरचंद थे |

 

  • रूपचंद का नाम” मानिकचंद के नाटक में भी मिलता है जो 1562 के आसपास लिखा गया है |

* फिरोजशाह तुगलक ज्वालामुखी मंदिर से 1300 पुस्तकें फ़ारसी में अनुवाद के लिए ले गया था इन पुस्तकों का फ़ारसी में दलिल ए फिजशाही के नाम से अनुवाद इजुद्दीन ख़ालिदखानी ने किया था|

 

* तैमूरलंग ने 1398 में शिवालिक की पहाडियों  को लुटा था| उस समय वहां का राजा मेघ चंद था| 1399 में वापिसी में तैमूर लंग के हाथों धमेरी (नूरपुर) को लुटा गया| हिंदूर (नालागढ़) के राजा आलम चंद ने तैमूर लंग की सहायता की थी|

 * गुलेर राज्य की स्थापना हरिचंद ने की थी| गुलेर को हड़सर भी बोला जाता था|

 

 * मुगलवंश – अकबर के समकालीन राजा 1) धर्म चंद 1528 से 1563 2) मानिक चंद 1563 से 1570   3) जयचंद 1570 से 1585  4) विधि चंद 1585 से 1605 |

 2) त्रिलोकचंद-

त्रिलोकचंद (1605) में कांगड़ा का राजा बना जोकि  विधिचंद का पुत्र था 1589 ई.  में  विधिचंद ने पहाड़ी राजाओं  से मिलकर  विद्रोह किया परन्तु हार मिली । और अपने पुत्र त्रिलोकचंद को मुगल दरबार में रखा , जिस वर्ष त्रिलोकचंद काँगड़ा का राजा बना । उसी वर्ष (1605 ई.) में  जहांगीर भी गद्दी पर बैठा था । त्रिलोकचंद जहांगीर का समकालीन राजा था ।

3)चंद्रभाग सिंह (1627 ई. से 1660 ई. तक)-काँगड़ा वंश का अगला राजा चंद्रभाग सिंह हुआ जिसे मुगलों ने “राजगीर की जागीर”     देकर अलग जगह बसा दिया । औरंगजेब  के  द्वारा   चंद्रभाग सिंह को 1660 ई. में गिरफतार  किया गया ।

4) विजयराम चंद (1627 ई. से 1670 ई. तक ):-विजयराम चंद ने विजापुर शहर की नींव रखीं  और उसे अपनी राजधानी बनाया ।  

5)आलम चंद  (1697 ई .  से 1700 ई. ) ने 1697 ई. में सुजानपुर के पास आलमपुर शहर की नींव रखी ।

6)हमीरचंद (1700ई.   1747 ई. )आलमचंद के पुत्र हमीरचंद ने हमीरपुर में  किला बनाकर हमीरपुर शहर की नींव रखी 

 काँगड़ा का आधुनिक इतिहास    –

1)अभयचंद –(1747 ई. -1750ई. ) अभयचंद ने ठाकुर थ्वारा और 1948 ई. में टिहरा के किले की स्थापना की थी ।

2)घमण्ड चंद –

(1751ई. -1774 ई. ) सुजानपुर शहर की नींव घमण्ड चंद ने 1761 ई.मेंरखी ।घमण्ड चंद को 1759 ई. में अहमदशाह दुर्रानी ने जालंधर दोआब का निजाम बनाया  । घमण्ड चंद की 1774ई. में मृत्यु  हो गई ।

3)संसार चंद -2    (1775 ई. -1824 ई. )संसार चंद     ने    जय सिंह कन्हैया को काँगड़ा किले पर कब्जे के लिए 1781 ई. में बुलाया । सेफअली खान की मृत्यु के बाद 1783  ई. में जय सिंह कन्हैया ने काँगड़ा किले पर कब्जा कर लिया । 1787 ई. में इसने संसार चंद को काँगड़ा किला सौंप दिया तथा बदले में मैदानी  भू-भाग ले लिया ।

संसार चंद के आक्रमणतथा पतनसंसार चंद  के  द्वारा रिहलू के लिए चम्बा के राजा  को नेप्टी शाहपुर में हराया । उसने मण्डी के राजा ईश्वरी सेन को बंदी बना कर 12  वर्षों तक नादौन में रखा जिसे बाद मे. अमर सिंह थापा ने  छुड़वाया । संसार चंद ने 1794 ई. में बिलासपुर पर आक्रमण किया जो बाद में उसके पतन का कारण बना ।   अमर सिंहथापा ने 1805ई. में बिलासपुर , सुकेत , सिरमौर चम्बा की संयुक्त सेनाओके साथ मिलकर महलमोरियों (हमीरपुर) में  संसारचंद  को हराया । संसारचंद ने काँगड़ा किले में शरण ली ।

संसार चंद के द्वारा किए गई महत्वपुर्ण घटनाए

1809 – महाराजा रणजीत सिंह के साथ ज्वालामुखी संधि

1809 – संसार चंद ने काँगड़ा किला और 66 गांव महाराजा रणजीत सिंह के दिए ।

1824 – संसारचंद की मृत्यु के बाद अनिरूद्ध चंद ने एक लाख रूपया रणजीत सिंह को नजराना देकर गद्दी पर  बैठा  ।

 गुलेर रियासतगुलेर रियासत का पुराना नाम ग्वालियर था । गुलेर रियासत की स्थापना काँगड़ा के राजा  हरिचंद ने 1405 ई. में हरिपुर में की जहॉ उन्होने शहर व किला बनवाया । हरिपुर गुलेर रियासत की राजधानी थी ।यह कांगड़ा से अलग होनी वाली दुसरी रियासत थी ।

1) रामचंद  –  (1540 – 1570ई. )गुलेर रियासत के 15 वें  राजा जयचंद   को पकड़ने में मुगलों की सहायता की ।

2)जगदीश चंद ( 1570-1605 ई. )   –जगदीश चंद ने 1572 ई.में  काँगड़ा के विद्रोह  को दबाने के लिए जो सेना भेजी थी उसमें भाग नहीं लिया था ।

3)रूपचंद (1610 -1635 ई.)जहॉगीर ने रूपचंद को बहादुर की उपाधि दी  क्योंकि रूपचंद ने काँगड़ा किले पर कब्जे के लिए मुगलों की सहायता की थी ।

4)मानसिंह – (1635- 19661 ई. ) मानगढ का किला मानसिंह के द्वारा बनाया गया था । शाहजहाँ ने मानसिंह को शेर अफगान की उपाधि दी थी ।

5)राज सिंह (1675 -1695  ई. )मुगलों को हराने में राज सिंह का बहुत बडा सहयोग है ।  राज सिंह  ने चम्बा के राज  चतर सिंह बसौली के राजा धीरज पाल और जम्मु के राजा किरलपाल देव के साथ मिलकर मुगलों को हराया था ।

6)प्रकाश सिंह (  1760 -1790 ई. )प्रकाश सिंह के समय घमण्ड चंद ने गुलेर पर कब्जा किया। बाद में संसार चंद ने गुलेर पर  कब्जा  किया ।

7)भूप सिंह ( 1790- 1820 ई.) –  भूपसिंह  गुलेर का आखिरी राजा था ।  भूप सिंह के पुत्र शमशेर सिंह (1820-1877 ई. ) ने सिक्खों से वीरपुर किला आजाद करवा लिया था । शमशेर सिंह और बलदेव सिंह (1920 ई. ) गुलेर वंश के राजा बने । 1846ई. में गुलेर पर अंग्रेजों का शासन स्थापित हो गया ।  

नूरपूर राज्य  –नुरपुर का प्राचीन नाम धमेरी था । नूरपूर  राज्य राजधानी पठानकोट (पैठान )  थी ।नूरपूर के राजावासुदेव ने अकबर के समय नूरपूर की राजधानी पठानकोट से नूरपूर बदली । नूरपुर रियासत के राजाओं के वंशज का नाम पठानिया था । जो कि पैथान शब्द से उत्पन हुआ था ।

 तख्तमल (1558 -1580 ई. ) – तख्तमल को भक्तमल के स्थान परराजा बनाया गया । यह भक्तमल का भाई था ।

बासदेव (1580 -1613 ई.) –बासदेव ने नूरपुर की राजधानी पठानकोट से धमेरी बदली । बासदेव ने कई बार मुगलों के विरुद्ध विद्रोह किया । अकबरनामा में वासदेव को राजा बासू कहा गया है ।  उसने 1585 , 1589 -90 तथा 1594 -95  , 1602-03 ,1603-04 में अकबर के विरुद्ध विद्रोह किया ।

सुरजमल (1613-19 ई. )-वासुदेव के बाद सुरजमल को नूरपुर का राजा बनाया  गया । वह बासुदेव का पुत्र था ।

जगतसिंह (1619 -46 ई. ) –जगतसिंह  के समय जहॉगीर 1622ई. में अपने पत्नी के साथ धमेरी आया  । जगतसिंह ने नूरजहॉ के सम्मान में धमेरी का नाम नूरपुर रखा ।

राजरुप सिंह (1646- 61 ई. )शाहजहॉ ने जगत सिंह की मृत्यु के बाद राजरुप सिंह को बदरवशां के अभियान मेंभेजी सेना का  अध्यक्ष बनाया । औरगजेव ने उसे 3580 हजारी का मानसब और दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह का पीछा करने के लिए सेना  देकर  गढवाल भेजा ।

मान्धाता (1661-1700ई. ):-राजा जगतसिंह की  प्रशंसा में लिखी राजगाथा का आधा भाग मान्धाता द्वारा ही लिखा गया था । मुगलों की सहायता व प्रशंसा प्राप्त करने वाला  मान्धाता आखिरी पठानिया था ।

पृथ्वी सिंह ( 1753 -89 ई.) – पृथ्वीसिंह के समय घमण्डचंद जस्सा सिंह रामगढिया ,ने नूरपुर क्षेत्र पर कब्जा बनाये  रखा । बर्ष 1785  ई. में नूरपुर रियासत लखनपुर  के पास स्थानातंरित हो गई ।जो कि 1846 ई. तक वही रही

वीर सिंह (1789- 1846 ई):-वीर सिंह नूरपुर रियासत पर शासन  करने वाला अतिंम राजा था । वीरसिंह ने  अपने राज्य पर महाराजा रणजीत सिंह का कब्जा होने के बाद जागीर लेने से  इंकार कर दिया । नूरपुरऔर  जसवॉ के राजा 1815 ई.  के रणजीत सिंह  के स्यालकोट सैनिक सम्मेलन  में नहीं गए थे । वीर सिंह ने 1826 ई. नें महाराजा रणजीत सिंह के विरुद्ध विद्रोह किया था ।   

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