भाषाएं एवं लिपि :–

सिरमौर धारटी:-सिरमौर के धारटी क्षेत्र  में धारटी बोली बोली जाती है।

विषबाई :—-सिरमौर जिले के गिरिपार क्षेत्र में जो शिमला से जुड़ा हुआ है ,बहा पर बिश्बाई बोली बोली जाती है

सोलन :—-सोलन और शिमला जिले में   महाअसुवि उपभाषा बोली जाती है।

बघाटी:-सोलन क्षेत्र में बघाटी बोली प्रचलित है ,जो बघाट रियासत में प्रसिद्ध थी।

बघलानी:-बघाल रियासत अर्थात कुनिहार और अर्की क्षेत्र में बघलानी बोली प्रचलित है।

हिण्डोरी :-नालागढ़ क्षेत्र में हिण्डोरी बोली प्रचलित है।

बिलासपुर :-बिलासपुर   जिले में कहलोरी बोली बोली जाती है। टी ग्राहम बेली ने बिलासपुर की बोलियों को छह बर्गो में बांटा गया है।

शिमला जिला :-

क्यूँथली :-शिमला शहर के आसपास क्योंथल राज्य के नाम पर क्योंथलि बोली प्रचलित है

कोच्ची  :–सतलुज घाटी ,रामपुर बुशहर ,कुमारसेन ,और कोटगढ़ क्षेत्र में कोच्ची बोली प्रचलित है।

बरारी :-जुब्बल के बरार  तथा रोहरु तहसील में बरारी बोली प्रचलित है।

किरन:-थरोच राज्य के किरन क्षेत्र में किरन बोली बोली  जाती है।

कुल्लू :कुल्लू जिले की प्रमुख बोली कुलुबी  है। इसकी तीन उपबोलियाँ है :सिराजी,सैनजी और कुलुबी है

मलाणा गांब की बोली म्लानि है 

मंडी:-

मंडी जिले की बोली मंडयाली है। सुंदरनगर और सुकेत में सुकेती बोली प्रचलित है। इसके अलावा सरकाघाट में सरघाटि,बल्ह में बाल्डी   उपबोलियाँ प्रचलित है।

चम्बा:-चम्बा जिले में चम्ब्याली बोली बोली जाती है। स्थानीय बोलियों में भटियात ,चुराह में चुरहि ,पांगी में पंगबाली  तथा भरमौर में भरमौरी बोली प्रचलित है।

काँगड़ा,ऊना,हमीरपुर :-इन तीनो जिलों में कांगड़ी बोली प्रचलित है।

किनौरी :-

किनौरी बोली जिसे होमसकद कहते है ,किनौर के —-% लोग बोलते है। यहां की कुछ उपबोलियाँ है :—

संगनूर :—पूह तहसील के संगनूर की बोली

जंगियम:-मोरंग के जंगी ,लिप्पा,और अस्रंग की बोली

शुमको :–पूह के कानाम ,लबरांग,शाइसो की बोली

लाहौल-स्‍पीति :-

भोटी:-यह स्पीति तथा चंद्रा और भागा घाटी  में बोली जाती है

गेहरी:—-यह केलांग क्षेत्र में बोली जाती है

मनछत और चांग्सा :—–यह दोनों बोलियां लाहौल की चिनाब घाटी में बोली जाती है।

लिपि :

पहाड़ी भाषा की लिपि टांकरी है ,जो बनियों द्वारा हिसाब-किताब में प्रयोग की जाती थी। इसी लिपि में पहाड़ी राज्यों के अभिलेख और फरमान लिखे जाते थे। काँगड़ा और चम्बा के राजाओं ने टाकरी लिपि का प्रयोग अपने राजकाज के कार्यों में किया। हबुलर ने टांकरी लिपि को शारदा लिपि का सुधरा हुआ रूप माना है। बर्तमान में पहाड़ी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। 

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