शिमला पहाड़ी रियासतों में बुशहर सबसे बड़ी और रतेश (2 वर्ग मील ) सबसे छोटी रियासत है।  शिमला जिले की पहाड़ी रियासतों का विवरण निम्नलिखित है।

* बलसन – 

बालसन रियासत की स्थापना सिमौर रियासत के राठोड वंशज “अलक  सिंह  ” ने  12वी  शताब्दी  में की थी।  यह  रियासत 1805 से पूर्व सिरमौर  रियासत की जागीर थी।  गोरखा आक्रमण के समय यह रियासत कुमारसेन की जागीर थी  और इस पर जोग  राज  सिंह  का राज था । जोगराज सिंह ने गोरखा युद्ध में ब्रिटिश सरकार की सहायता  की और नामन दुर्ग   डेविडऑक्टरलोनी को  सौंप  दिया था।  बलसन के शासक  ठाकुर जोगराज सिंह को  स्वतंत्र सनद 1815  में प्रदान की।  बलसन रियासत ने 1857  के विद्रोह  में ब्रिटिश सरकार का साथ दिया।  और बहुत से यूरोपीय नागरिकों  को  यहां  शरण दी।  बलसन के शासक जोगराज को ब्रिटिश  सरकार ने 1858  में  “खिल्लत  ” और “राणा “

का ख़िताब  दिया।  बलसन रियासत  का वरीयता में शामिल पहाड़ी रियासतों  में 11वां  स्थान था।  बलसन रियायत के अंतिम राजा रण  भादूर सिंह थे।  “हिस्ट्रीऑफ़बलसन स्टेट ” उन्ही की लिखी किताब  है।  “वर्तमान में बलसन’ठियोग’  तहसील  का हिस्सा है”।

* भज्जी –

भज्जी रियासत की स्थापना कुटलेहर रियासत के वंशज  “चारु ” ने की थी  जिसने  बाद  में अपना नाम  बदलकर  “उदयपाल” रख लिया था।  चारु की 29 बीं पीढ़ी के सोहनपाल  ने  सुन्नी शहर की स्थापना कर भज्जी रियासत की राजधानी  सुन्नी स्थानांतरित  की।  भज्जी रियासत पर 1803  से 1815  तक गोरखों  का कब्ज्जा  रहा ।  गोरखों को 1815  में निकालने के बाद ब्रिटिश सरकार ने राणारुद्रपाल को स्वतंत्र सनद  प्रदान की।  राणारुद्रपाल1842  में  राजगद्दी  त्याग कर हरिद्वार  आश्रम  में रहने लगे।  भज्जी रियासत के “अंतिम शासक राजा राणा रामचंद्र पाल  थे”। 1948 में  तहसील बनाकर    हिमाचल प्रदेश में  विलय किया गया।

* कोटी –

कोटी रियासत  की स्थापना कुटलेहर रियासत के वंशज चारु  के  भाई ” चंद्र ”  ने की थी।  कोटी रियासत की राजधानी कोटी थी जिसे बाद में ताराचंद  ठाकुर ने क्यारकोटी में स्थानांतरित किया।  कोटी की  रियासत  पर  1809 में  गोरखों ने कब्ज़ा  कर  लिया ।  1815  में कोटी रियासत पुनः  क्योंथल रियासत की  राजधानी बन गयी।  हरिचंद  ने  1857 में  अंग्रेजों  की मदद की जिसके बदले उन्हें “राणा” ख़िताब दिया गया।  कोटी रियासत कुसुम्पटी तहसील का भाग  बनकर 1948  में हिमाचल प्रदेश में  मिल  गयी।

* दारकोटि –

दारकोटि रियासत की स्थापना मारवाड़ से आये दुर्गा चंद ने की थी।  दारकोटि रियासत वर्तमान में कोट खाई तहसील में पड़ती है। दारकोटि1948 में महासू जिले में मिला दी गयी।

* थरोच –

थरोच  रियासत की स्थापना उदयपुर के सिसौदिया वंश के राजकुमार “किशन सिंह ” ने की थी जिन्हे थरोच जागीर उपहार स्वरूप सिरमौर रियासत से प्राप्त हुई। ठाकुर कर्म सिंह 1815  में गोरखा आक्रमण के समय थरोच के शासक थे।  ब्रिटिश सरकार ने 1843 में थरोच से अपना नियंत्रण हटा कर रणजीत सिंह को गद्दी पर बिठाया।थरोच रियासत के अंतिम शासक ठाकुर सूरत सिंह को “राणा” की स्थाई उपाधि मिली।  15 अप्रैल 1948  को चौपला में मिलाकर हिमाचल प्रदेश का भाग बनाया गया।

*   रियासत थरोच की प्रशाखा थी जिस पर बाद में बुशहर का कब्ज़ा हो गया।  गोरखा आक्रमण के समय   रबिन्गद  में मिला दी गयी।  1896 में   जुब्बल रियासत की जग्गीर बना दिया गया।  1948 में   जुब्बल तहसील का भाग बनकर हिमाचल प्रदेश में मिली।

* कुमारसेन –

कुमारसेन रियासत की स्थापना गया (बिहार) से आये “किरातचंद” ने की थी।   अजमेर सिंह ने कुल्लू के राजा मान सिंह को हराकर ‘साडी’ और ‘शांगरी’ किले पर कब्जा किया था।  गोरखा आक्रमण के समय कुमारसेन बुशहर रियासत की जागीर थी।  कुमारसेन के राजा केहर सिंह ने गोरखा आक्रमण के समय कुल्लू रियासत में शरण ली थी।  राणा प्रीतम चंद ने श्रीगढ़ दुर्ग की घेरबंदी में ब्रिटिश सरकार की मदद की थी।  राणाविद्याधार सिंह कुमारसेन के अंतिम शासक थे।  कुमारसेन15 अप्रैल 1948  को महासू जिले का भाग बना।

* खनेटी –

खनेटी रियासत की स्थापना कुमारसेन रियासत के संस्थापक किरातचंद के पुत्र “सबीरचंद” ने की थी।  गोरखों के बाद खनेटीबुशहर रियासत की जागीर बन गई जो 1890 में लाल चंद ठाकुर के शासन में स्वतंत्र हो गई।

* देलथ –

देलथ रियासत की स्थापना किरातचंद के भाई पृथ्वी सिंह ने की थी।  यह भी 1815  में बुशहर रियासत की जागीर थी।  देलथ  को 15 अप्रैल 1948 में बुशहर रियासत में मिलाकर महासू जिले का हिस्सा बनाया गया।  वर्तमान में यह रामपुर बुशहर तहसील का भाग है।

* धामी –

धामी रियासत की स्थापना पृथ्वीराजचौहान के वंशज “गोविन्द पाल” ने की थी जो राजपुरा से धामी आया था।  धामी रियासत के राजा राजसिंह ने ‘पाल ‘ के स्थान पर सिंह ‘प्रत्यय’ लगाना शुरू किया। गोरखा आक्रमण से पूर्व धामी बिलासपुर रियासत की जागीर थी।  धामी पर 1805 से 1815  तक गोरखों का कब्जा रहा।  अंग्रेज – गोरखा युद्ध में धामी के राजा गोवेर्धन ने अंग्रेजों का साथ दिया जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें स्वतंत्र सनद प्रदान की।  राणागोवेर्धन सिंह ने   1857  के विद्रोह में भी अंग्रेजों की सहायता की थी।  धामी रियासत की राजधानी ‘ हलोग’ थी।  धामी को 15 अप्रैल 1948 में कुसुम्पट्टी तहसील का भाग बनाकर महासू जिले में मिलाया गया।

* जुब्बल –

जुब्बल रियासत की स्थापना उगरचंद के पुत्र और शुभंश प्रकाश के भाई कर्म चंद ने 1195 में की थी।  जुब्बल रियासत शुरू में सिरमौर रियासत की जागीर  थी जो की गोरखा ब्रिटिश युद्ध के बाद स्वतंत्र हो गयी।  कर्म चंद ने जुब्बल रियासत की राजधानी सोनपुर में स्थापित की जिसे बाद में उन्होंने पुराना जुब्बल में स्थानांतरित किया।  जुब्बल रियासत की राजधानी पुराना जुब्बल से देवराणा गौर चंद ने स्थानांतरित की।  गोरखा आक्रमण के समय पूर्ण चंदजुब्बल रियासत के शासक थे।  जुब्बल रियासत 1815 को स्वतंत्र रियासत बनी।  राणा पूर्ण चंद को ब्रिटिश सरकार ने “राणा ” की उपाधि प्रदान कर  स्वतंत्र सनद प्रदान की।  जुब्बल रियासत में 1841 में थरोच1896  में रावी को मिलाया गया।

* रविन्गद  (रावीं) –

रविन्गद रियासत की स्थापना सिरमौरी राजा उग्र चंद के तीसरे पुत्र दुनिचंद ने की थी।  सिरमौर के राजा वीर प्रकाश ने रविन्गद  दुर्ग की स्थापना की।  रविन्गद  रियासत के अंतिम राजा टिक्काफतेह सिंह थे।  रविन्गद वर्तमान में जुब्बल तहसील का भाग है।

* रतेश  –

रतेश  रियासत की स्थापना कर्म प्रकाश के भाई राय सिंह ने की थी।  राजा सोमर प्रकाश ने रतेश को रियासत की राजधानी बनाया।  रतेश सबसे छोटी पहाड़ी रियासत थी।  रतेश सिरमौर और क्योंथल  की जागीर थी।  गोरखा आक्रमण के समय किशन सिंह ने सिरमौर में भाग कर अपनी जान बचाई थी। ठाकुर शमशेर  सषनगरी रियासत के अंतिम शासक थे।

* शांगरी –

      शांगरी रियासत पहले बुशहर के अधीन थी जिस पर कुल्लू के राजा  मान सिंह  ने कब्ज़ा कर लिया था।  गोरखा ब्रिटिश युद्ध के बाद विक्रम सिंह शांगरी के शासक बने।  शांगरी रियासत 1815  में कुल्लू रियासत को सौंपी गयी। हिरा सिंह को   1887  में ‘राय ‘ की उपाधि प्रदान की गयी।  राय रघुवीर सिंह शांगरी रियासत के अंतिम शासक थे।

* क्योंथल –

     क्योंथल रियासत की स्थापना सुकेत रियासत के संस्थापक बीरसेन के छोटे भाई गिरिसेन ने 1211 में की थी।  1379 में क्योंथल रियासत फिरोजशाह तुगलक के अधीन में आ गयी थी।  1800 से पूर्व क्योंथल रियासत के अधीन 18  ठकुराइयाँ थी।  कोटि, घुंड, ठियोग, महलोग ,कुठार ,कुनिहार, धामी ,थरोच ,शांगरी ,कुमारसेन ,रजाना ,खनेटी, मैली, खालसी, बघारी ,दीघयाली और घाट  हितेन्दर सेन क्योंथल रियासत के अंतिम शासक थे।

* घुण्ड –

    घुण्ड रियासत की स्थापना जनजान सिंह ने की थी।  घुण्ड रियासत क्योंथल रियासत की जागीर थी।  जो 1815 में पुणे क्योंथल रियासत की जागीर बन गयी।  घुण्ड रियासत के अंतिम शासक रणजीत सिंह थे। 

* ठियोग – 

     ठियोग रियासत की स्थापना कहलूर रियासत के जयचंद्र ने की थी।  ठियोग रियासत क्योंथल रियासत की जागीर  थी।  कृष्णचंद ठियोग रियासत के अंतिम शासक थे।  “ठियोग रियासत भारत में विलय होने वाली हिमाचल प्रदेश की पहली रियासत थी”।

* मधान  –

      मधान  रियासत की स्थापना कहलूर रियासत के राजा भीम चंद के दूसरे पुत्रऔर जैस  चंद ,जनजान सिंह के भाई भूप सिंह ने की थी।  मधान  क्योंथल रियासत की जागीर थी।   नरेंद्र सिंह  मधान रियासत के अंतिम शासक थे।  मधान  रियासत ठियोग में मिलकर 1948 में महासू जिले का भाग बनी।

* कोटखाई  –

     कोटखाई रियासत की स्थापना कुम्हारसेन के अहिमाल सिंह ने की थी।  कोटखाई कुमारसेन ,कुल्लू और बुशहर की जागीर रही थी।  गोरखा ब्रिटिश युद्ध के बाद कोटखाई राणा रणजीत सिंह को दी गयी तथा कोटगढ़ ब्रिटिशरों ने स्वयं अपने पास रखी।

* करांगला – 

    करांगला  की स्थापना कुम्हारसेन के संसार चंद ने की थी। करांगला  रियासत बुशहर रियासत की जागीर थी।

* सारी – 

     सारी  रियासत की स्थापना 1195  में उगरचंद  के दूसरे पुत्र मूल चंद ने की थी।  रोहणू  सारी रियासत के अधीन था। पूर्ण सिंह सारी के अंतिम शासक थे।  ब्रिटिश सरकार  ने 1864  में सारी  को नजराने के रूप में  बुशहर रियासत को दे दिया।

*  बुशहर रियासत –

  स्थापना – 

   बुशहर रियासत की स्थापना श्रीकृष्ण के पुत्र प्रदुमन  ने की थी।  वह अपने पुत्र  अनिरुद्ध का विवाह शोणितपुर के राजा बाणासुर की पुत्री से करने आये थे।  बाणासुर की मृत्यु के बाद प्रदुम्न ने बुशहर रियासत की स्थापना की और कामरु  को बुशहर रियासत की राजधानी बनाया।  प्रदुम्न के 110बें   वंशज राजा चतर सिंह ने राजधानी कामरु से सराहन  स्थान्तरित की। राजा पदम सिंह बुशहर रियासत के अंतिम शासक थे।

शिमला शहर का इतिहास 

* शिमला का नामकरण –

        शिमला शहर का नामकरण श्यामला देवी के नाम पर हुआ जो की  भगबती काली का दूसरा नाम है।  रोथनि कैंसल के पास जाखू पहाड़ी पर श्यामला देवी का छोटा सा मंदिर था जिसे ब्रिटिश काल में काली बाड़ी में स्थित  किया गया।  श्यामला देवी के नाम पर ही शिमला नामकरण हुआ।  शिमला के आस पास की छोटी बड़ी 28 रियासतों को ब्रिटिश सरकार ने इकट्ठा कर 1816 में शिमला जिले का गठन किया।

* शिमला शहर की खोज   –

     1817  में स्कॉटलैंड के 2  अधिकारीयों कैप्टेन पैट्रिक जेराड और अलेक्जेंडर  जेराड ने अपनी डायरी में शिमला का वर्णन किया था।  शिमला पहाड़ी रियासत के पहले असिस्टेंट पॉलिटिकल एजेंट लेफ्टिनेंट रोज ने 1819 में शिमला में शिमला की सर्वप्रथम खोज की और लकड़ी का मकान बनवाया।  चार्ल्स पैट कैनेडी ने 1822  में शिमला में पहला पक्का मकान बनवाया जो कैनेडी हाउस के नाम से विख्यात हुआ।  “लार्ड एमहर्स्ट शिमला आने वाले पहले गवर्नर जनरल थे”  जो 1827 में शिमला के ग्रीष्मकालीन प्रवास के दौरान कैनेडी हाउस में ठहरे थे।  लार्ड एमहर्स्ट ने इस प्रवास के दौरान ये शब्द कहे थे -” मैं और चीन का राजा आधी मानव जाती पर राज करते हैं फिर भी हमे नाश्ते का समय मिल जाता है। ”  शिमला शहर 1 नवंबर , 1966  को हिमाचल प्रदेश में मिलाया गया तब से लेकर अब तक यह हिमाचल प्रदेश की राजधानी है।

Shimla District Geography

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