सिरमौर जिले के प्राचीन निबासी कुलिंद थे। कुलिंद राज्य मौर्य साम्राज्य के शीर्ष पर होने के कारण शिरमौर्य”  कहा गया।जो कि  बाद  में सिरमौर बन  गया।  तारीख -ए-रियासत सिरमौर  रंजौर सिंह की पुस्तक  के अनुसार  सिरमौर रियासत का  प्राचीन नाम सुलोकिना था। इसकी स्थापना 1139.   राजा  रसालु ने  की  थी ,जोकि  जैसलमेर के राजा के  पुत्र थे। उनकी राजधानी सिरमौरी ताल थी    । जनश्रुतियों  के अनुसार राजा रसालु  की पूर्बजों के नाम  पर सिरमौर का नाम पड़ा । इस क्षेत्र में  सिरमौरी देवता की पूजा होती थी जिससे  इस राज्य का नाम सिरमौर  पड़ा था।

एक अन्य जनश्रुति के अनुसार मदन सिंह ने अपनी पत्नी  को   धोखा देकर मरवा दिया ,उसकी  पत्नी   के   श्राप से नदी की   बाढ़ में पूरी की पूरी रियासत बह गयी और कोई उत्तराधिकारी नहीं बचा ,इस घटना के पश्चात जैसलमेर के राजा सालबाहन द्वितीय ने अपने  तीसरे पुत्र हाँसू और उसकी गर्भबती रानी को सिरमौर  भेजा। हाँसू की   मृत्यु के बाद रानी ने एक राजकुमार को  जन्म  दिया ,जिसका नाम पलासू रखा गया तथा राजबंश का नाम पलासिया कहा जाने लगा।

1934  . में गजेटियर ऑफ़ सिरमौर के अनुसार जैसलमेर  के राजा  उग्रसेन (सालबाहन द्वित्य )हरिद्वार में   आये । वहां सिरमौरी रियासत को खाली देख कर उन्होंने अपने  पुत्र शोभा रावल ,जिनको शुभंश   प्रकाश के नाम से जाना जाता है ,को सिरमौर रियासत की स्थापना के लिए भेजा। शुभंश प्रकाश ने 1195 .  में राजबन  को सिरमौर रियासत की राजधानी  बना दिया और सिरमौर रियासत की स्थापना कर  दी ।

माहे प्रकाश :– शुबंश प्रकाश की मृत्यु के बाद माहेप्रकाश को 1199.    में   गद्दी का कार्यभार सौंप दिया गया। उनके  शासनकाल में सिरमौर की सीमाएं गढ़वाल ,भागीरथी ,श्रीनगर और नारायणगढ़ तक  फ़ैल गई। उन्होंने भागीरथी नदी के पास मालदा किले पर  कब्जा  कर के उसका नाम माहे देवल  रखा था।राजा माहे प्रकाश का  कार्यकाल 1199-1217 ई .तक  रहा।

 उदित प्रकाश :–उदित प्रकाश राजा ने  सिरमौर की राजधानी राजबन से कालसी  स्थान्तरित की। राजा उदित प्रकाश का  कार्यकाल 1217-1227 ई. तक  रहा।

 

कौल प्रकाश :– राजा  कौल   प्रकाश का  कार्यकाल 1227-1239 ई . तक  रहा।

कौलप्रकाश  ने जुब्बल  ,बालसन  और थरोच को अपने अधीन कर उसे  अपनी जागीर बनाया।  राजा कौल प्रकाश   ने  1235 .    में रजिया सुल्तान के बिरोधी   निजाम उल मुल्क को शरण  दी   थी   ।

सुमेर प्रकाश :-राजा  सुमेर प्रकाश ने क्योंथल की जागीर रतेश को अपने अधीन कर   लिया और  उसे  सिरमौर  रियासत की राजधानी बनाया। राजा सुमेर प्रकाश का  कार्यकाल 1239-1248 ई.  तक  रहा।

 

सूरज प्रकाश  :– राजा  सूरज  प्रकाश का  कार्यकाल  1374-1386 ई.  तक  रहा।

राजा सूरजप्रकाश ने  जुब्बल ,बालसन ,कुमारसेन ,घुंड ,सारी,ठिओग ,रावी  और  कोटगढ़ को अपने अधीन कर लिया और लगान  बसूले। और सिरमौर रियासत की  राजधानी रतेश से पुन: कालसी में  स्थापित  की ।

भक्त प्रकाश:- राजा भक्त प्रकाश फिरोजशाह तुगलक के समकालीन थे। राजा भक्त प्रकाश का  कार्यकाल  1374-1386 ई.  तक  रहा। 1379 ई. में फिरोजशाह  तुगलक ने सिरमौर  रियासत  को   अपनी जागीर बनाया ,उस  समय  बहां  राजा भक्त प्रकाश  का शासनकाल था । फिरोजशाह के  पुत्र   मुहम्मद शाह   ने  सिरमौर   की पहाड़ियों में  शरण  ली   थी ।

जगत  प्रकाश :– राजा  जगत प्रकाश का  कार्यकाल  1386-1388 ई.  तक  रहा। राजा जगत   प्रकाश के शासनकाल में जुब्बल ,बलसन  ,राबिनगढ़  और कुम्हारसेन ने  विद्रोह   किया और  स्वयं को सिरमौर रियासत से   स्वतंत्र करा  लिया था।

वीर प्रकाश :– राजा  वीर प्रकाश का  कार्यकाल  1388-1398 ई.  तक  रहा। राजा   वीर प्रकाश ने  हाटकोटी  को   अपनी राजधानी बनाया। और बहा  पब्बर नदी  के   किनारे माँ भगबती दुर्गा    का   मंदिर बनबाया। राजा   वीरप्रकाश   ने  ही    रावीनगढ़ किला बनबाया ।

राजधानी  का  स्थांतरण :– नेकट प्रकाश ने सिरमौर रियासत की राजधानी गिरी  नदी के  तट पर नेरी  गांब में  स्थापित की। बाद में  गर्बप्रकाश ने(1414-1432) रियासत की राजधानी नेरी से जोगड़ी किले में स्थानांतरित की। 1432-1444 ई. में  ब्रह्मप्रकश ने राजधानी पच्शाद के देवठल में स्थापित की।1578-1570 ई. में धर्मप्रकाश ने पुन: राजधानी देवठल से बदलकर कालसी में स्थापित की।

दीपप्रकाश :1573 ई.  में राजा दीपप्रकाश ने सिरमौर के त्रिलोकपुर में  बाला  सुंदरी मंदिर का निर्माण करबाया।

बुद्धिप्रकाश:–बुद्धिप्रकाश ने अपनी राजधानी  कालसी से स्थानांतरित  कर राजपुर बनाई।

कर्मप्रकाश :–1621 ई.  में राजा कर्मप्रकाश ने बाबा बनबारी  दास के परामर्श से सिरमौर  रियासत की राजधानी राजपुर से स्थानांतरित करके नाहन स्थापित की। राजा कर्मप्रकाश ने ही नाहन  शहर और नाहन किले की नींब रखी।

मन्धाता प्रकाश :-राजा मन्धाता शाहजहां का समकालीन  राजा था। उसने काँगड़ा के फौजदार नजाबत खां और  इराज खां  की गढ़वाल अभियान में मदद की थी।

सोभागप्रकाश:  राजा  सोभागप्रकाश शाहजहां और ओरंगजेब का समकालीन राजा था।

बुद्धप्रकाश :-राजा बुद्धप्रकाश सोभागप्रकाश के बड़े पुत्र थे ,इनका बास्तबिक नाम महीचंद था। इनको बुद्धप्रकाश की उपाधि से ओरंगजेब ने सम्मानित कर सिरमौर का राजा स्वीकार किया। राजा बुधप्रकाश  की राजदरवार   में  अच्छी पहुँच थी ,बह बेगम जहांआरा को कस्तूरी ,अनार ,बर्फ आदि के उपहार भेजा करते थे। उसका बेगम के साथ बराबर पत्र ब्यबहार होता  रहता था। बुद्ध प्रकाश की सेना को देषु की धार पर क्योंथल की सेना ने पराजित किया था।

मेदनी प्रकाश :–मेदनी प्रकाश को मत प्रकाश भी कहा जाता था। मेदनी प्रकाश  के शासनकाल में गुरु गोबिंद  सिंह नाहन और पौंटा आये थे। गुरु गोबिंद सिंह 1684-1688 ई.  तक  पौंटा  साहिब में  रहे  और भगानी  साहिब  का  युद्ध लड़ा। 1681 ई.  में मदानी प्रकाश  ने ही नाहन में जगन्नाथ मंदिर का निर्माण  करबाया था ।

हरिप्रकाश :–हरिप्रकाश के  शासनकाल के समय बंदा बहादुर सिरमौर  आया था।

भूप प्रकाश :–राजा भूप प्रकाश को खिलत्त सहित  भीम प्रकाश  की उपाधि से मुगल शाह  मुहम्मद मुआजिम  बिन आलमवीर  ने  सम्मानित  किया   था । भूपप्रकाश की रानी ने कालिस्तान में मंदिर  का निर्माण करवाया था।

कीरत  प्रकाश  :-

कीरत   प्रकाश  ने  श्रीनगर(गढ़वाल के राजा  को हराकर नारायणगढ़ ,रामपुर,रामगड़,मोरनी ,पिंजौर  और जगतगढ़ पर अधिकार कर लिया था। गोरखा कमांडर अमरसिंह थापा के बीच एक संधि हुई ,जिसके अनुसार  गंगा  नदी को गोरखा और सिरमौर राज्य के  बीच  सीमा माना गया ।

जगत प्रकाश  :-1781 ई.  में जॉर्ज फास्टर   नाहन आया था। राजा जगत प्रकाश ने 1785 ई. में रोहिल्ला खण्ड  के गुलाम कदीर  रोहिल्ला को कटासन  में हराया और विजय स्मृति में बहा पर कटासन देवी (दुर्गा मंदिर का निर्माण) करवाया

धर्मप्रकाश :—-धर्मप्रकाश  हिंडूर के राजा  रामशरण  सिंह ,कहलूर के राजा महानचन्द,काँगड़ा के राजा संसारचंद का समकालीन राजा  था । संसारचंद के साथ  लड़ते हुए राजा  धर्मप्रकाश  की मृत्यु होगए थी।  उनकी  मृत्यु के बाद उनका भाई कर्मप्रकाश -II ने राजगद्दी संभाली।

कर्मप्रकाश –II:–कर्मप्रकाश  के शासनकाल में  उनके  बजीर मेहता प्रेम सिंह की मृत्यु के बाद रियासत में घरेलू बिद्रोह होने लगा। कर्मप्रकाश 1803  ई.  में परिवार के साथ क्यारदा दून  के  काँगड़ा  किले में रहने लगे। उन्होंने इस विद्रोह को दबाने के लिए  गोरखों को आमंत्रित किया। अमरसिंह  के पुत्र रंजौर सिंह ने सिरमौर रियासत को अपने अधीन ले लिया। रंजौरसिंह  ने बहां  पर  जातक  दुर्ग  का  निर्माण करवाया। राजा कर्मप्रकाश  अपनी  मृत्युकाल तक  अम्बाला के भूरियाँ  में शरण लेकर रहा ।

फ़तेह  प्रकाश : सितम्बर 1815   को गबर्नर  जनरल ने फ़तेह प्रकाश  को  गद्दी पर बिठाया। फ़तेह सिंह की बाल्य अबस्था के कारण राज्य का पूरा कार्यभार उनकी माता गुलेरी रानी को   सौंप  दिया गया।  कप्तान जी. बर्च को उनकी सहायता  के लिए असिस्टेंट एजेंट नियुक्त  किया गया। 21 सितम्बर 1815 ई.  को एक सनद द्वारा  सिरमौर राज्य की  मोरनी  ,क्यारदा  दून और जौनसार   बाबर क्षेत्र को  अंग्रेज सरकार ने अपने अधीन ले लिया। 5 सितम्बर 1833 ई. में   राजा फ़तेह प्रकाश  को एक सनद 50 हज़ार रुपए के नजराने पर क्यारदा दून क्षेत्र बापिस लौटा दिया गया। फतेहप्रकाश  ने नाहन में  शीशमहल और मोतीमहल का निर्माण करबाया    था। और पंचकूला में फतेहकोठी का निर्माण करवाया।

शमशेर प्रकाश  :—राजा शमशेर को 10  बर्ष की आयु में राज्य सौंप दिया था ,उस  समय विल्लियम हे ने सिरमौर जिले  का प्रशासन चलाने के लिए1857 ई. में मेहता  देवी दत्त और मोतीराम भंडारी के नेतृत्ब  में  कमेटी  बनाई। 1857 ई.   के विद्रोह में  अंग्रेजो  की सहायता की थी । बिद्रोह की समाप्ति  पर  अंग्रेजी  सरकार ने राजा शमशेर प्रकाश  को  सात   तोपों  की सलामी दी  थी  और जिसे  1867 में बढ़कर 11 कर दिया था  और कुंबर सिंह सुरजन  को खिलत दी थी। शमशेर  प्रकाश ने राज्य  का प्रशासन  अंग्रेजी  सरकार  की प्रशासन प्रणाली पर  चलाने का  प्रयास  किया। राजा   शमशेर ने राज्य को चार तहसीलों में बांटकर तहसीलदार   नियुक्त  किये । 1878  ई. शमशेर प्रकाश  ने पहली  बार लाहौर  के मुंशी  नंदलाल  की  देख रेख में जमीन  का बंदोबस्त कराया। इस बंदोबस्त का बिरोध संगड़ाह के नम्बरदार   उशबू  और प्रीतम सिंह  ने किया  जिन्हे  पकड़कर  राजा के पास नाहन भेज  दिया। 1887 ई. में  दूसरी  बार जमीन का  बंदोबस्त परमेश्वरी  सहाये की देख  रेख में हुआ। राजा  शमशेरप्रकाश ने सबसे लम्बी  अबधि 42 बर्ष तक सिरमौर  का  कार्यभार  संभाला। शमशेर   प्रकाश  ने 1867 ई.  में नाहन में  नाहन  फाउंड्री  नाम  से लोहे का  कारखाना  खोला शमशेरप्रकाश  के   कार्यकाल में  1867  ई. में  रानीताल बाग़ ,1868 ई.   में  MUNICIPAL  नाहन  कमेटी की   स्थापना  हुई। 1878  ई.   में  शमशेरप्रकाश  ने   लार्ड लिटन के नाहन प्रवास  की स्मृति में लिटन  मेमोरियल और दिल्ली  गेट बनाया ।

1880  ई.   में  शमशेर प्रकाश  ने  अपने  रहने के लिए शमशेर बिला  बनबाया ।। 1884 ई.  में  नाहन में  डिस्ट्रिक्ट  बोर्ड  का मुख्यालय  खोला गया। 1893 ई.  में शमशेरप्रकाश ने ही सिरमौर  में  नाहन  नेशनल बैंक की स्थापना की  ,इसका नाम 1944 ई.   में बदलकर बैंक ऑफ़  सिरमौर रखा गया ।

राजा शमशेर प्रकाश के  बाद 1898-1911 ई.   में   सिरमौर राज्य  का  कार्यभार टिक्का  सुरेंद्र विक्रम सिंह  ने  संभाला ।

सुरेंद्र विक्रम  प्रकाश : —-

 अंग्रेज  सरकार   ने 1901-में   KCSI(KNIGHT COMMANDER OF THE ORDER OF THE STAR OF THE INDIA    ) की उपाधि से सम्मानित  किया। 1902 ई.  में  सुरेंद्र विक्रम  प्रकाश को भारत  सरकार ने 5 बर्ष  के लिए इम्पीरिअल लेजिस्लास्टिव  कौंसिल    का  सदस्य बनाया ।  राजा   सुरेंद्र विक्रम  प्रकाश  की 4  जुलाई 1911 ई. को  मसूरी   में  मृत्यु  हो गई  ।

अमरप्रकाश :1918  ई. में  राजा  अमरप्रकाश  को ब्रिटिश  सरकार  द्वारा “महाराजा “ और1915 ई.में   KCSI(KNIGHT COMMANDER OF THE ORDER OF THE STAR OF THE INDIA )   की उपाधि से अलंकृत  किया । अमरप्रकाश ने अपनी पुत्री के नाम पर महिमा पुस्तकालय की स्थापना  की थी ,जो की हिमाचल  प्रदेश का सबसे    पुराना  पुस्तकालय है। उन्होंने   नाहन-काला अम्ब  सड़क को 1927 ई. में   पक्का करवाया । उनकी  मृत्यु आस्ट्रिया की राजधानी वियाना  में 1933  ई.में हुई।

राजेंद्र   प्रकाश :–राजेंद्र प्रकाश   सिरमौर रियासत के   अंतिम राजा थे। राजा  राजेंद्र प्रकाश के समय 1937   ई. में  सिरमौर प्रजामंडल की स्थापना हुई थी। और 1942 ई.  में  पझौता  आंदोलन हुआ था। पझौता  आंदोलन में “किसान सभा ” का गठन हुआ जिसका सभापति “लक्ष्मी सिंह “और सचिब बैध सूरत सिंह को चुना गया । 13 मार्च 1948 ई. में  को महाराज राजेंद्र प्रकाश  ने विलेय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। सिरमौर   15  अप्रैल   1948   को हिमाचल प्रदेश का जिला बना। 

 

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